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"Why the Heart Is Dying"

कदृन ध्वनि उठी है घात से
मिट रहे हृदय समानुपात से

जमा धन अविछिन्न है
घटा-बड़ा कर रहे जात से

कौन किसके सिमटे में जाता है
उठ रही ध्वनि बिन बात के

तोड़ रहा वह मनों को सांंच से
उठ रही अब साँचो में आंच सी

कौन किसके हृदय बसा 
यह प्रश्न भी है बहुत बड़ा

ले चल मन के मोती
बना किसी सोच को

इंसा मिट रहा यहां बिन बात के 
रुक सके तो रुक दे

कदृन ध्वनि पीड़ित पात्र की
क्यों उठ रही चीख रातों में

लगती है यह घात सी
हृदय पीड़ा से भरा

हर कोई क्यों यहां सोया है पड़ा 
रुकती क्यों नही पीड़ा की

रोती हुई सौगात से
और क्यों अब भी मिट रहे ह्रदय 
समानुपात से .......
-सोहन सिंह

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